mystery of human

आत्मबोध

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आदमी ही सुख है …
आदमी ही दुख है l

आदमी ही दोस्त है…
आदमी ही दुश्मन है ll

आदमी ही है पतन की गहराइयों में l
आदमी ही है अमरत्व की ऊंचाइयों में ll

हवस भी है आदमी और वासना भी है आदमी l
अशांति भी है आदमी और क्लेश भी है आदमी ll

आदमी ही देता जख्म और आदमी ही लगाता मरहम l
आदमी ही है ‘जीने की उमंग’ जो है आदमी की सांसो का रूप रंग रूप रंग ll

दूर “क्षितिज “के कोने से एक प्रतिबिंब आदमी कह रहा…
छोड़ मन के चोचले ओ आदमी ,

…. तुम अपना लो सच ,
आदमी तुम अपना लो ‘सच’ – इसमें है ,

सीधी साधी सरलता ,
फूलों की कोमलता ,

चंद्रमा की शीतलता ,
सूरज की स्वर्णिम सुंदरता ,

रिश्तो की मृदुलता ,
मौसम की चंचलता ,

..आदमी तुम अपना लो ‘सच’
दिल में छुपी अभिलाषाओं के लिए,

कल्पनाओं को साकार करने के लिए ,
आदमी …तुम हो ज्ञान-विज्ञान और प्रतिभावान ,

आखिर कब मिलेगा मौका ,
अपने स्वस्थ उत्कृष्ट जीवन के लिए ,

….आदमी तुम अपना लो ‘सच’
……अपना लो ‘सच’

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2 thoughts on “आत्मबोध”

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